खेती में अमोनिया इस्तेमाल को मिली मंजूरी
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यूरिया की मारामारी तो हर किसान झेल चुका है, लंबी लाइनें, कम स्टॉक और बढ़ती डिमांड। इसी परेशानी को कम करने के लिए भारत सरकार ने अब एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने खेती में सीधे "एनहाइड्रस अमोनिया" के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी है, जिसमें यूरिया के 46% नाइट्रोजन के मुकाबले पूरे 82% नाइट्रोजन मिलता है। 23 जुलाई को जारी नोटिफिकेशन के मुताबिक, कोई भी यूनिट अब अगले 3 साल तक इसका उत्पादन कर सकती है।
भारत बनेगा ऐसा करने वाला चौथा देश
अगर यह प्रयोग कामयाब रहा, तो भारत, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के बाद, दुनिया का चौथा ऐसा देश बन जाएगा जो खेती में सीधे अमोनिया का इस्तेमाल करेगा। यह सुनने में जितना बड़ा कदम लगता है, असल में उतनी ही बड़ी चुनौती भी है, क्योंकि गैस लीक होने का खतरा हमेशा बना रहता है।
असली चुनौती क्या है?
इंडस्ट्री के टॉप अधिकारी की मानें, तो सिर्फ मंजूरी देना काफी नहीं, असली मुश्किल है इसे लागू करना। यूरिया प्लांट्स हर साल 2,000 से 6,000 टन तक फालतू अमोनिया बनाते हैं, जिसे अभी तक बेचा जाता रहा है। अब सरकार चाहती है कि इसका सीधा इस्तेमाल खेतों में हो, लेकिन इसके लिए जमीन के अंदर इंजेक्ट करने वाला पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना बाकी है।
ट्रायल्स में क्या मिला?
रबी 2025-26 सीजन में 13 ICAR (इंडियन कॉउन्सिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च) संस्थानों में इसका ट्रायल हुआ। डायरेक्ट सीडेड राइस में ग्रीन अमोनिया के इस्तेमाल से कुछ जगहों पर पौधों की ग्रोथ और हरियाली सामान्य यूरिया से भी बेहतर दिखी। हालांकि कुछ खेतों में अमोनिया का असमान वितरण होने से ग्रोथ भी असमान रही, जिससे साफ है कि अभी टेक्नोलॉजी को और स्टैंडर्डाइज़ करने की जरूरत है।
ग्रीन यूरिया की तरफ भी कदम
इसी दिशा में एक और बड़ा प्रोजेक्ट चल रहा है, आंध्र प्रदेश के पुदीमदका में एनटीपीसी की रिसर्च विंग NETRA द्वारा 150 TPD का ग्रीन यूरिया प्लांट लगाया जा रहा है, जो कार्बन कैप्चर टेक्नोलॉजी और वाटर इलेक्ट्रोलिसिस को जोड़ता है।
आगे क्या होगा इस पहल का परिणाम
जुलाई का महीना खेती के लिहाज से सबसे अहम होता है, क्योंकि इसी दौरान सबसे ज्यादा बुवाई होती है और यूरिया की मांग भी सबसे ज्यादा रहती है। भारत हर साल करीब 100 लाख टन यूरिया इम्पोर्ट करता है, तो जाहिर है, अगर अमोनिया वाला यह प्रयोग सफल रहा, तो आने वाले सालों में इम्पोर्ट पर निर्भरता काफी हद तक कम हो सकती है।
ट्रैक्टर ज्ञान की राय?
यह कदम किसानों के लिए राहत की उम्मीद जगाता है, लेकिन सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर और सही स्टैंडर्डाइजेशन के बिना जमीनी स्तर पर इसे लागू करना आसान नहीं होगा। फिलहाल इसे एक सकारात्मक शुरुआत के तौर पर देखा जा सकता है, न कि तुरंत मिलने वाले समाधान के तौर पर।
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